Monday, 26 October 2015

चंद्र और लक्ष्मी की आराधना का पर्व है शरद पूर्णिमा

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी शरद पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है। माना जाता है कि पूरे वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रदेव अपनी सोलह कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। शरद पूर्णिमा को कई स्थानों पर कोजागरी व्रत के नाम से भी पुकारा जाता है क्योंकि इस दिन विधि-विधान से व्रत करके माता लक्ष्मी और चंद्रदेव को प्रसन्न किया जाता है जिससे अनेक साधन और सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
महालक्ष्मी की करें आराधना 
शरद पूर्णिमा के माहात्म्य के संबंध में पुराणों में वर्णित है कि इस रात्रि को धन व समृद्धि की अधिष्टात्री देवी महालक्ष्मी पृथ्वीलोक पर आती हैं और रात्रि जागरण कर भगवान नारायण एवं महालक्ष्मी की पूजा करने वाले भक्तों को धन और सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
निशीथे वरदा लक्ष्मी कोजागर्तीति भाषिणी। 
जगती भ्रमते तस्याम लोकचेष्टावलोकिनी। . 
तस्मै वित्तं प्रयच्छामि यो जागर्ति महीतले। 
श्री कृष्ण की करें आराधना
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की शांत एवं श्वेत रात्रि में भगवान श्री कृष्ण ने वृन्दावन में महारास का आयोजन किया था। इसलिए इस रात्रि को जागरण करते हुए भगवान श्री कृष्ण की आराधना करने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है। इसलिए शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
चंद्रदेव का जपें मंत्र
नव ग्रहों में चंद्र को समस्त नक्षत्रों का स्वामी माना गया है। इसलिए  शरद पूर्णिमा की रात्रि में ग्रह शान्ति के उद्देश्य से  सभी राशि के जातकों को श्वेत वस्त्र, अक्षत, चन्दन, धूप, डीप, श्वेत पुष्प, सुपारी आदि से चंद्रदेव का पूजन करते हुए गाय के दूध और चावल से बनी खीर का प्रसाद लगाना चाहिए। कहा जाता है कि चंद्रमा की धवल रोशनी में रखी गयी खीर पर चंद्रदेव अपनी शीतल रश्मियों का अमृत बरसाकर उसे औषधिमय बना देते  जिसके सेवन से शरीर व्याधिमुक्त बना रहता है। चंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए शरद पूर्णिमा की रात्रि में ॐ सोम सोमाय नमः मंत्र का ग्यारह हजार बार जप करना शुभ होता है।
इसके अलावा शरद पूर्णिमा की सायंकाल में शुद्ध घी के ग्यारह दीपक जलाकर उन्हें मंदिर, तुलसी के पौधे और पीपल के वृक्ष की जड़ की पास रखते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त, लक्ष्मीस्तवं और कनकधारा स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है तथा कमलगट्टा, सुपारी, पंचमेवा एवं बेल के फल से ॐ ह्रीं श्री दारिद्र्यनाशिन्ये नारायणप्रियवल्लभायै भगवत्यै महालक्ष्यै स्वाहः मंत्र का जप करते हुए एक सौ आठ आहुति देकर हवन भी किया जाता है।
कार्तिक स्नान और मास की शुरुआत
शरद पूर्णिमा के साथ ही आश्विन मास का अवसान होता है और अगले ही दिन से पवित्र कार्तिक मास की शुरुआत हो जाती है। इसलिए शरद पूर्णिमा के दिन से ही पवित्र नदियों में स्नान करके कार्तिक मास के लिए व्रत और स्नान का आरंभ हो जाता है। कार्तिक मास में महिलाएं अपने और परिवार के कल्याण के लिए प्रतिदिन तांबे के बर्तन में जल भरकर गाय के दाहिने सींग को सींचती हैं और उसी जल से अभिषेक करने के बाद गाय को हरा चारा एवं अनाज आदि खिलाती हैं। कार्तिक मास में तुलसी, आंवला, और कदली वृक्षों का पूजन करके भगवान विष्णु तथा विष्णुप्रिया लक्ष्मी जी को प्रसन्न किया।  विष्णु पुराण के अनुसार कार्तिक मास में किये गए पूजा, दान-धर्म और व्रत-उपवास से पुण्य लाभ मिलता है तथा मृत्यु के बाद विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा 

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