Tuesday, 30 September 2014

शक्ति पीठ : मां विंध्यवासिनी
आदि शक्ति मां भगवती दुर्गा की उपासना के लिए देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मंदिर बने हुए हैं। मां दुर्गा के विशेष पूजा स्थल भी हैं जिन्हें शक्ति पीठ कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथो के अनुसार देवी सती के द्वारा अपने अपमान के प्रतिरोधस्वरूप स्वयं को पिता के अग्निहोम में भस्म किया गया था। उनके शरीर के अलग-अलग अंग जिन-जिन स्थानों पर गिरे, वे शक्ति पीठ के रूप में पूज्य हैं। मां दुर्गा के इक्यावन शक्ति पीठों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। लेकिन देवी दुर्गा का एक शक्ति पीठ ऐसा भी है जहां माता सती का कोई अंग नहीं गिरा बल्कि इस स्थान को देवी भगवती ने अपने आवास के लिए चुना और जन्म के बाद यहां विराजमान हो गयीं।
उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले से आठ किलोमीटर दूर गंगा नदी के किनारे विंध्याचल पर्वत पर मां विंध्यवासिनी देवी का मंदिर स्थित है।
धार्मिक ग्रंथो के अनुसार वासुदेव और देवकी के आठवीं संतान के रूप में श्री कृष्ण ने अपने मामा कंस के कारागार में जन्म लिया तो वहीँ नन्द और यशोदा के यहां महायोगिनी  योगमाया ने जन्म लिया। भगवान विष्णु के आदेश से कृष्ण को कंस के कारागार से निकालकर उनकी जगह योगमाया को पहुंचा दिया गया। अगले दिन जब कंस ने उस कन्या रूपी योगमाया को मारने का प्रयास किया तो वह कंस के हाथों से छूटकर कंस को यह चेतावनी दे गयी कि उसको मारने वाला जन्म ले चुका है और सुरक्षित है। योगमाया ने इसके बाद अपने लिए उस स्थान को रहने के लिया चुना, जहां आज विंध्यवासिनी मंदिर है। महायोगिनी महामाया के विंध्याचल पर्वत पर रहने के कारण उनका नाम विंध्यवासिनी देवी कहलाया।
विंध्याचल पर्वत पर देवी भगवती अपनी तीन शक्तियों महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती के रूप में त्रिकोण के तीन बिन्दुओं पर विराजमान हैं। महालक्ष्मी विंध्यवासिनी के रूप में पूर्व भाग में, महाकाली चामुण्डा देवी के नाम से दक्षिण भाग में और महासरस्वती अष्टभुजा देवी के रूप में पश्चिम दिशा में स्थित गुफा में विराजमान हैं। इस प्रकार विंध्यवासिनी सम्पूर्ण भारत में एक ऐसा शक्ति पीठ है जहां तीन देविओं का त्रिकोण है। इसलिए तीन देवियों का यह त्रिकोण तंत्र-मंत्र और देवी की विशेष उपासना के रूप में तीन महा शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है।
विंध्यवासिनी देवी का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व है। यहां चैत्र और आश्विन नवरात्रों में पूर्ण विधि-विधान से देवी भगवती की उपासना की जाती है जिसमें देश-विदेशों से देवी भक्त शामिल होते हैं। कहते हैं देवी भगवती के यहां विराजमान होने के बाद शबर, बर्बर और पुलिंद नामक भक्त उनकी आराधना करते थे। विंध्यवासिनी मंदिर के बगल में स्थित सप्तशती भवन में श्रद्धालु दुर्गासप्तशती का पाठ करते हैं।
विंध्यवासिनी के अष्टभुजी रूप महासरस्वती भी यहां एक गुफा में विराजमान हैं। इस अवतार में उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नामक दैत्यों का मर्दन किया था। इसके अलावा विंध्यवासिनी में काली खोह के रूप में महाकाली भी विराजमान हैं। कहते हैं इस  रूप में देवी ने चामुण्डा का रूप धारण किया और रक्तबीज नामक दैत्य का समस्त रक्त पान करके देवताओं को  अत्याचार से मुक्ति दिलाई। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसका रक्त बिन्दुओं के रूप में जितना पृथ्वी पर गिरेगा, उतनी संख्या में नए रक्तबीज पैदा हो जायेंगें। काली खोह के पृष्ठ भाग में स्थित भूत भैरव के मंदिर में प्रेत बाधा से पीड़ित लोग आते हैं और भूत भैरव के दर्शन करके प्रेत बाधा से मुक्ति पाते हैं।
आदि शक्ति मां भगवती के त्रिकोण स्वरुप के दर्शन और आराधना भक्तों के लिए विशेष फलदायी होती है।  जो भक्त विंध्यवासिनी की श्रद्धा और विश्वास के साथ आराधना करते हैं उन्हें  भगवती की कृपा से समस्त शुभ-लाभ प्राप्त होते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद , आगरा 

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