Friday, 28 March 2014

स्वास्थ्य और शक्ति के पोषण का पर्व है नवरात्र एवं रामनवमी

  चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा 31 मार्च, 2014से नवरात्र का शुभारम्भ हो रहा है। यह तिथि नवसंवत्सर के आरम्भ की तिथि भी है, जिसमें प्लवंग संवत्सर वर्ष भर रहेगा। इस संवत्सर के स्वामी सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्माजी हैं। नवरात्र नौ दिनों तक शक्ति की आराध्या माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना से जुड़ा एक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व रखने वाला पर्व है , जिसे चैत्र नवरात्र के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्र के अंतिम  और नौवें दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की भी आराधना की जाती है। भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने से पूर्व भगवान् शिव और माँ भगवती की आराधना करके उनसे आंतरिक शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की थी।
   नवरात्र पर्व धार्मिक आस्था एवं विश्वास से जुड़ा पर्व तो है ही, साथ ही इस पर्व का हमारे स्वास्थ्य और पवित्रता से भी विशेष सम्बन्ध है। क्योंकि इस पर्व को मनाने वाले श्रद्धालु अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति के अनुरूप नवरात्र में व्रत उपवास करते हुए पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और पवित्र भावना के साथ मन की चंचलता को नियंत्रित करते हैं तथा संयमित जीवन व्यतीत करते हैं। नवरात्र में माँ भगवती के समक्ष अग्नि प्रज्वलित करके शुद्ध घी, समिधा, कपूर, लौंग, गूगल आदि पवित्र वस्तुओं को उसमें समर्पित करने से हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध और पवित्र होता है। जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे स्वास्थ्य को बनाये रखने में सहायक सिद्ध होता है।
   नवरात्र पर्व में देवी जी की पूजा के दौरान पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से जिन मंत्रों का पाठ किया जाता है वे भी हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के पोषक होते हैं। इन मन्त्रों के प्रभाव से मन के समस्त विकार दूर होने लगते हैं जिससे हमारे शरीर में  आश्चर्यजनक सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। होली पर्व के समापन के बाद और चैत्र मास के आरम्भ के साथ ही मौसम में बदलाव आने लगता है जो हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।  परन्तु नवरात्र में पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास, सयंमित जीवनचर्या और शुद्ध आचरण के प्रभाव से बदलते मौसम का प्रतिकूल असर शरीर पर नहीं होने पाता। वर्ष भर अच्छे स्वास्थ्य के लिए चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सात नीम की कोपलें, सात तुलसी दल और सात नग कालीमिर्च का सेवन करना शुभ प्रभावकारी माना गया है।
    नवरात्र में माँ भगवती और भगवान श्री राम की उपासना हेतु श्री दुर्गा सप्तशती, राम चरित मानस और नवान्ह पारायण के पाठ का विधान है।  दुर्गा शप्तशती में दिए गए मन्त्रों का ध्यानपूर्वक तथा पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से पाठ करने से तन और मन दोनों ही स्वस्थ बने रहते हैं। इसी प्रकार श्री राम चरित मानस में भी बहुत सी ऐसी चौपाईयाँ हैं जिनके नियमित पाठ से समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा विद्या, धन, संपत्ति, सफलता और आरोग्य सुख प्राप्त होते हैं। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के 29 वें श्लोक में कहा गया है -      " रोगानशेषानपहंसी तुष्टा रुष्टा तु कामान सकलानमिष्टान्।
 त्वामाश्रीतानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांति।।"
अर्थात देवी तुम प्रसन्न होने पर सभी रोगों को नष्ट कर देती हो तथा कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उनपर विपत्ति  नहीं आती।  तुम्हारी शरण में जाए हुए मनुष्य दूसरों की शरण देने वाले हो जाते हैं।
    परम गोपनीय पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाले देवी के कवच का पाठ करने से मनुष्य समस्त ऐश्वर्य, विजय, धन सम्पदा और चेचक, कुष्ठ एवं विष जनित रोगों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। दुर्गा शप्तशती में कीलकम् के पाठ से आरोग्य सुख मिलता है। वहीँ दुर्गा शप्तशती का सम्पूर्ण पाठ करने से भयंकर से भयंकर रोग, ग्रह बाधाएं, बुरे स्वप्न से होने वाली पीड़ाएं, धनाभाव, कष्ट, शत्रु बाधा आदि नष्ट हो जाते हैं और बुद्धि का कल्याण होने के साथ ही अंतःकरण की शुद्धि होती है।--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद् 
  
 

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