Friday, 4 October 2013

जन-जन के प्रणेता हैं महाराजा अग्रसेन

     एक ईंट और एक रूपया देकर समाज के कमजोर वर्ग के लोगों का आर्थिक विकास करके समतावाद स्थापित करने का स्वप्न साकार करने वाले अग्रवाल शिरोमणि महाराजा अग्रसेन का नाम जन-जन के प्रणेता के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है प्रताप नगर के सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा वल्लभ तथा महारानी भगवती के पुत्र अग्रसेन बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी एवं मेधावी थे 
     अग्रसेन की योग्यता, शास्त्रों में निपुणता, सहिष्णुता, करुणा, सौम्यता, सौहार्दता और दयाभाव से प्रभावित होकर नागराज कुमुट की सुपुत्री माधवी ने अपने स्वयंवर में पधारे वीर योद्धा, महाराजा, देवता और राजाओं को छोड़कर अग्रसेन के गले में वरमाला डाल कर उनका पति के रूप में वरण कर लिया जिससे देवराज इंद्र ने नाराज होकर उनके राज्य में वर्षा नहीं की. परिणामस्वरूप राज्य में सूखा पड़ने से प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गयी, परन्तु अग्रसेन जी ने विचलित हुए बिना अपने इष्ट देव भगवान् शिव की आराधना की भगवान् शिव की अनुकम्पा से अग्रसेन जी के राज्य में न केवल प्रचुर वर्षा हुई बल्कि वहां सुख-समृद्धि और खुशहाली आ गयी
     महाराजा अग्रसेन ने समता और समाजवाद पर आधारित एक ऐसे समाज की स्थापना की जहाँ न तो कोई छोटा था और न कोई बड़ा उन्होनें अपने राज्य में समस्त निवासियों के लिए धन-संपदा एवं वैभव हेतु महालक्ष्मी जी की कठोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और उनसे समस्त सिद्धि और धन-वैभव प्राप्त होने का आशीर्वाद लिया।
     महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य में यज्ञ के समय दी जाने वाली पशु-बलि का न सिर्फ विरोध किया बल्कि यह आदेश भी लागू कर दिया कि राज्य का कोई भी मनुष्य पशुओं की बलि नहीं चढ़ाएगा और न ही पशुओं का वध करके उनका मांस भक्षण करेगा। अग्रसेन जी का कहना था कि मनुष्यों के समान समस्त जीव-जंतुओं में भी प्राण होते हैं उनका वध करने का अर्थ है जीवों के प्रति हिंसा।
     समस्त वेद, वेदों के छः अंग, निरुक्त ज्ञान, ज्योतिष, व्याकरण, कल्प शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र संचालन आदि में प्रवीण महाराजा अग्रसेन ने अग्रोहा गणराज्य की स्थापना की उनके राज्य के निवासियों को योध्या तथा अगेया के नाम से जाना जाता था उनके राज्य में कहीं कोई दुखी व दरिद्र नहीं था कहते हैं कि उनके राज्य में करीब एक लाख परिवार निवास करते थे। जब भी कोई नया व्यक्ति बाहर से आकर परिवार सहित उनके राज्य में बसना चाहता, एक ईंट-एक रूपया नीति के तहत उसे बसने के लिए एक लाख ईंट और व्यवसाय के लिए एक लाख रुपये मिल जाते। 
    समाज के निर्धन वर्ग के उत्थान की दिशा में महाराजा अग्रसेन की यह नीति अपने आप में अनोखी थी क्योंकि इसमें समाज के पारस्परिक सहयोग से राज्य के समस्त नागरिकों को समानता का अधिकार देने की निःस्वार्थ भावना थी जिसमें किसी तरह का कोई भेद-भाव, दाता अथवा याचक का भाव नहीं होता था
    गुरुसेवी, सत्यवादी, कूटनीतिज्ञ, प्रजापालक, कुशल शासक, दूरदर्शी एवं वीर योद्धा के रूप में महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य पर आक्रमण करने वाले राजाओं को पराजित किया और अनेक युद्धों में विजय पताका फहराई। अग्रसेन जी ने एक सौ आठ वर्षों तक कुशलतापूर्वक शासन करके दुनिया को यह सन्देश दिया कि स्व हित का त्याग करके राज्य की जनता की भलाई के लिए पूर्ण समर्पण भाव से राजा के कर्तव्यों का निर्वहन करना ही सबसे बड़ी सेवा है
    महाराजा अग्रसेन जी ने अपने राज्य में जनहित में स्कूल, अस्पताल, धर्मशालाएं, बावडी आदि का निर्माण कराया।  महाराजा अग्रसेन जी ने काम, क्रोध, लोभ और मद को अपने वश में रखने तथा सदैव धर्मपूर्ण आचरण पर चलने की शिक्षा समाज को दी उन्होनें अपने राज्य में आत्मनिर्भरता, समानता, जीवन मूल्य, धार्मिक सहिष्णुता, समाजवाद, निष्काम कर्म, दयालुता, सत्यवादिता, कृतज्ञता जैसे दिव्य आदर्श गुणों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी
    जन-जन के प्रणेता महाराज अग्रसेन जी का सम्पूर्ण जीवन दर्शन सभी के लिए न सिर्फ अनुकरणीय है बल्कि वर्तमान समय के लिए सामयिक भी है।अग्रसेन जी के बताये गए सिद्धांत और नीतियों को अपनाकर एक सुखी, समृद्ध और सामाजिक समरसता पर आधारित समाज की स्थापना की जा सकती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

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