Thursday, 17 October 2013

18 अक्तूबर , 2013 : शरद पूर्णिमा पर विशेष:

     आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि को शरद पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने मुरली वादन करते हुये पतित पावनी यमुना जी के तट पर गोपियो के साथ रास रचाया था इसलिये इसे "रास पूर्णिमा" भी कहा जाता है. नारद पुराण में इस तिथि को "कोजागर व्रत" कहा गया है।  पुराण और शास्त्रों के अनुसार इस दिन विधि-विधान से व्रत करके धन की देवी महालक्ष्मी, श्री कृष्ण और चन्द्र देवता की आराधना करने से धन-धान्य, सुख-शान्ति एवं सद्गति की प्राप्ति होती है।
     नारद पुराण में कहा गया है कि शरद पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान करके उपवास रखते हुए जितेंद्रिय भाव से रहना चाहिये। ताम्बे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र और आभूषण से सुसज्जित लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके उनकी धूप,  दीप,पुष्प, नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजन करते हुए घी, शक्कर, चावल तथा दूध से निर्मित खीर का प्रसाद लगाकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखना चाहिए। इस दिन रात्रि के समय दीप दान करना भी शुभ माना गया है।  ऐसा करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोग कर अन्त मे विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
    कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात में धन एवं समृद्धि की देवी महालक्ष्मी अपना रुप परिवर्तित करके भू लोक पर विचरण करते हुए यह देखती है कि कौन-कौन मनुष्य जागरण कर रहा है।  देवी भागवत के अनुसार जो मनुष्य इस रात्रि में पूर्ण श्रद्धा भाव, नियम-धर्म और पवित्र आचरण के साथ  भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी की  पूजा-अर्चना करते हुए जागरण करता  है, उस पर लक्ष्मी जी की असीम कृपा होती है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि, धन तथा शान्ति का कभी अभाव नही रह्ता है।
    शरद पूर्णिमा के दिन सन्तान सुख की कामना के साथ व्रत रखे जाने का भी विधान है।  इस सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है।  एक साहूकार की दो पुत्रियों में से एक पुत्री तो पूर्णमासी का व्रत विधि-विधान के साथ पूरा करती, जबकी दूसरी पुत्री आधे-अधूरे मन से व्रत रखती। इस कारण उसकी संतानें जीवित नहीं रह पाती थी।  एक बार जब उस पुत्री के नवजात पुत्र की मृत्यु हो गई तो उसने एक ब्राह्मण के कहे अनुसार अपने मृत पुत्र को पीढ़े पर लिटाकर कपडे से ढक दिया।  इसके बाद उसने अपनी बहन को बुलाया और उस पीढे पर बैठने को कहा।  जैसे ही उस बहन का वस्त्र मृत बच्चे के शरीर से छुआ, वह जीवित होकर रोने  लगा।  यह देखकर बहन क्रोधित हो गई और बोली, अगर पीढ़े पर बैठने से लड़का मर जाता तो क्या उसे कलंक नहीं लगता। बहन की बात सुनकर उसने कहा कि उसका पुत्र तो पहले से ही मृत था, वह तो तुम्हारे स्पर्श से जीवित हुआ है क्योंकि तुम जो श्रद्धा भाव से पूर्णमासी का व्रत करती हो वह उसी का पुण्य प्रभाव है।  इसके बाद उसने यह मुनादी  करवा दी कि जो भी स्त्री-पुरुष शरद पूर्णिमा का व्रत करेंगें, उनकी समस्त मनोकामनायें पूरी होंगी और उन्हे सन्तान का सुख भी प्राप्त होगा।
    शरद पूर्णिमा वाले दिन सायं काल में घर के मन्दिर में, तुलसीजी के पास, पीपल के वृक्ष के नीचे शुद्ध घी के दीपक प्रज्ज्वलित करने चाहिए। रात्रि में पूर्ण विधि-विधान से महालक्ष्मी का अनुष्ठान करते हुए पुरुष सूक्त, श्री सूक्त, लक्ष्मीस्तव, कनकधारा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। पाठ पूर्ण होने के बाद कमलगट्टा, सुपारी, पंचमेवा, नारियल, बेलफल, मखाने, हवन सामग्री आदि से मन्त्र "ॐ ह्रीं श्री दारिद्र्यनाशिन्यै नारायण प्रियवल्लभायै भगवत्यै महालक्ष्मये स्वाहा" का  जप करते हुए एक सौ आठ आहुतियों के साथ हवन करना चाहिए। यदि स्वयं पाठ करना सम्भव न हो तो किसी वैदिक ब्राह्मण से पाठ करवा कर एवं अपनी श्रद्धा के अनुसार भोजन कराकर अन्न, वस्त्र, फल, धन आदि दान देना चाहिए। इस प्रकार किए गए अनुष्ठान से अनन्त फल की प्राप्ति होती है।
    ज्योतिष मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्र देवता शोडश कलाओं से परिपूर्ण होते है. इस रात्रि  चन्द्रमा का प्रकाश अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक होता है।  इसलिए शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा को जल या दुग्ध मिश्रित जल से अर्घ्य देना, चन्द्रमा की रोशनी में खीर रखना, सुई में धागा पिरोना, रात्रि में चन्द्र दर्शन करना जैसे कार्य करना शुभ फल देने वाले माने गए है।  विवाह होने के बाद जो स्त्री-पुरुष पूर्णमासी का व्रत रखना चाह्ते है, उन्हें शरद पूर्णिमा से ही व्रत की शुरुआत करनी चाहिए।
    जन्म कुण्डली में ग्रह दोष होने पर शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का पूजन करके "ॐ श्रां श्री श्रौ सः सोमाय नमः" मन्त्र का जप करने से ग्रह शान्ति होने के साथ-साथ महालक्ष्मी और चन्द्र देवता की कृपा से विभिन्न समस्यायों का समाधान होता है तथा जीवन में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल,फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार

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