Thursday, 19 September 2013

पितृ ऋण से मुक्ति देता है श्राद्ध कर्म

वैदिक कर्मकांड के अंतर्गत होने वाले पांच महायज्ञों में श्राद्ध कार्य को विशेष महत्त्व दिया है. श्राद्ध में पिंड दान, तर्पण और ब्राहमण भोजन शामिल हैं. ऐसा माना जाता है कि ऋण से मुक्त होने के लिए पुत्र को श्राद्ध कर्म का पालन आवश्यक रूप से करना चाहिए। पुराणों के  अनुसार माता-पिता अथवा अन्य पूर्वजों की निर्वाण तिथि पर गया में पिंड दान करने, ब्राह्मण को भोजन कराने और तर्पण करने से पुत्र को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है.
   पितृ पक्ष में सूर्य देवता कन्या राशि के दशम अंश पर आते हैं और वहां से तुला राशि की ओर गमन करते हैं. सूर्य देव की इस गति को कन्यागत सूर्य कहा जाता है. इस स्थिति में अपने पितरों का श्राद्ध करना आवश्यक माना गया है. प्रति वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तिथि तक श्राद्ध पक्ष होता है. इस वर्ष 20 सितम्बर से पितृ पक्ष आरम्भ हो रहे हैं. 
श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों की शांति और तृप्ति के निमित्त पकाए हुए शुद्ध पकवान, दूध, दही, घी, मिष्ठान आदि का दान करने का विधान है. 
     ब्रह्म पुराण के अनुसार श्रद्धा पूर्वक किये गए श्राद्ध से पित्रगण  प्रसन्न होकर मनुष्य को धन, संतान, विद्या, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष एवं स्वर्ग प्रदान करते हैं. याग्वल्क्य के मतानुसार श्राद्ध करने के पुण्य प्रभाव से दीर्घायु, आज्ञाकारी पुत्र, धन, विद्या, दुर्लभ मोक्ष, संसार के समस्त सुख आदि प्राप्त होते हैं. 
   वर्ष की जिस तिथि को पूर्वज दिवंगत हुए हैं, उसी तिथि वाले दिन श्राद्ध करना चाहिए। इसके लिए श्राद्ध वाले दिन मनुष्य को प्रातः नित्य कर्मों से निवृत्त होने के उपरांत सुयोग्य ब्राह्मण को अपने यहाँ भोजन के लिए श्रद्धा पूर्वक आमंत्रित करना चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध और तर्पण से पितृगण तृप्त और प्रसन्न होकर समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं. इसलिए श्राद्ध वाले दिन ब्राह्मण को शुद्ध भोजन, वस्त्र, अन्न, दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करना चाहिए। इसके अलावा पकाए गए भोजन में से ,गौ माता, श्वान, काक, चींटी और देवताओं के नाम से भी ग्रास निकालना चाहिए। श्राद्ध कर्म की इस प्रक्रिया में भोजन के कुछ अंश को अग्नि देव को समर्पित करके भी जल से तर्पण किया जाता है. 
श्राद्ध कर्म के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि श्राद्ध सदैव अपने घर पर ही किया जाये। किसी दुसरे के घर पर किया गया श्राद्ध निषिद्ध होता है. श्राद्ध करते समय किसी तरह का दिखावा नहीं करना चाहिए तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही श्राद्ध में दान आदि करना उचित रहता है. धन के अभाव में घर में निर्मित खाद्य पदार्थ को अग्नि को समर्पित करके जल से तर्पण करते हुए गौ माता को खिला कर भी श्राद्ध कर्म पूर्ण किया जा सकता है. 
   श्राद्ध कर्म में कभी भी बासी अथवा अखाद्य पदार्थ नहीं परोसने चाहिए।धार्मिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के भोजन में बेंगन, गाजर, मसूर की दाल, अरहर की दाल, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, गोल लौकी,  जामुन,महुआ, चना, अलसी, काला  जीरा,पीली सरसों, आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध प्रभावहीन हो जाता है. 
  श्राद्ध पक्ष में किसी भी तरह के शुभ और मंगल कार्य को करना निषिद्ध माना गया है. इसके अलावा इन दिनों बाल कटवाना, घर में दही बिलोना, देव प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना, नए वस्त्र  खरीदना,मकान में पेंट या पुताई करवाना, संतान का विवाह करना अथवा विवाह की बात चलाना, नए मकान का मुहूर्त करना, कुआ खुदवाना, किसी नए कार्य या व्यापार की शुरुआत करना भी अशुभ माना गया है.  
   श्राद्ध के सम्बन्ध में यह जानना भी आवश्यक है कि जन्म देने वाले पूर्वजों जैसे  दादा-दादी और माता-पिता की मृत्यु के प्रथम वर्ष में श्राद्ध नहीं करना चाहिए। श्राद्ध करने का सही समय अपराह्न काल है. पूर्वाह्न में, सायं काल में, रात्रि के समय, चतुर्दशी तिथि को और परिवार के किसी सदस्य या स्वयं के जन्म दिन को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। कूर्म पुराण में कहा गया है कि अग्नि या विष आदि द्वारा आत्महत्या करके मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध नहीं करना चाहिए। जिन पितृगण की मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध अमावस्या की तिथि वाले दिन करना चाहिए। युद्ध के दौरान शस्त्र से मृत्यु को प्राप्त पितरों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जा सकता है. 
   श्राद्ध पक्ष वास्तव में पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने और नयी पीढी को अपनी प्राचीन वैदिक और पौराणिक संस्कृति से अवगत करवाने का पर्व है. इस पक्ष में ब्राह्मण को भोजन करने, दान-दक्षिणा आदि देने से हमारे पापों का अंत होता है, ग्रहों के दुष्प्रभाव दूर होते हैं और पितरों का आशीर्वाद एवं कृपा प्राप्त होने से समस्त सुख-सुविधाएं मिलने लगती हैं. पितरों का श्राद्ध करने से जन्म कुंडली में पितृ दोष से भी छुटकारा मिलता है.--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार 

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