Friday, 14 December 2012

पंचक विचार और ज्योतिष


ज्योतिष शास्त्र में पांच नक्षत्रों के समूह को पंचक कहते हैं। ये नक्षत्र हैं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद,  उत्तरा भाद्रपद और  रेवती।ज्योतिष विज्ञान के अनुसार चंद्रमा अपनी माध्यम  गति से 27 दिनों में सभी नक्षत्रों का भोग कर लेता है। इसलिए प्रत्येक माह में लगभग 27 दिनों के अंतराल पर पंचक नक्षत्र आते रहते हैं। 
पंचक नक्षत्रों के समूह में धनिष्ठा तथा सदभिषा  नक्षत्र  चर संज्ञक कहलाते हैं। इसी प्रकार पूर्व भाद्रपद को उग्र संज्ञक, उत्तरा  भाद्रपद को  को ध्रुव संज्ञक और रेवती नक्षत्र को मृदु संज्ञक माना जाता है। ज्योतिषविदों के अनुसार चर नक्षत्र में घूमना-फिरना, मनोरंजन, वस्त्र और आभूषणों की खरीद-फरोक्त करना अशुभ नहीं माना गया है। इसी तरह ध्रुव संज्ञक नक्षत्र में मकान का शिलान्यास, योगाभ्यास और लम्बी अवधि  की योजनाओं का क्रियान्वन भी किया जा सकता है।
मृदु संज्ञक नक्षत्र में भी गीत, संगीत, फिल्म निर्माण, फेशन शो, अभिनय करने जैसे कार्य किये जा सकते हैं। उग्र संज्ञक नक्षत्र में अदालत में लंबित मुकदमों तथा विभिन्न प्रकार के वाद-विवादों का निपटारा किया जा सकता है।
 पंचक काल में विवाह, मुंडन, उपनयन संस्कार, गृह प्रवेश, गृह निर्माण  और व्यावसायिक कार्य किये जा सकते हैं। पंचक काल में यदि कोई कार्य किया जाना अति आवश्यक हो तो इसके लिए पंचक दोष की शांति के निवारण का उपाय अवश्य कर लेना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार पंचक के दिनों में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर दाह - संस्कार  की क्रिया से पूर्व मृतक के शव पर पांच पुतले बना कर रखे जाने का विधान है।
पंचक के दिनों में लकड़ी के फर्नीचर बनाना  और खरीदना व बेचना, दक्षिण दिशा में यात्रा करना, चारपाई बनाना जैसे कार्यों पर प्रतिबन्ध बताया गया है, लेकिन यदि ऐसा करना आवश्यक हो  तो  नक्षत्र की स्थिति के अनुसार पंचक दोष के निवारण का उपाय अवश्य कर लेना शुभ रहता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद 

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